मेरी डायरी से किसी दिन मेरी लड़ाई जरूर होगी,
शब्द काटेंगे एक दिन मुझको, मेरी कलम से बगावत जरूर होगी....
वो किसी दिन पढ़ लेंगे अरस्तु और कौटिल्य को,
शब्द किसी दिन तर्क करना सीख जाएंगे,
खाली डायरी मुझसे सवाल करेगी,
मेरे झूठे बहानों पर तर्कों से तकरार जरूर होगी,
मेरी डायरी से मेरी लड़ाई जरूर होगी......
मैं भी लौट आऊंगा अपने पुराने जज्बे से,
सारी शिकायतों को मिटाकर नई रचनाएं लाऊँगा,
फोड़ेंगे ठोकरों से, ऊपर जमें हिमखंडों को,
मैं बसंत का महीना फिर लौटा लाउंगा...
मैं भी पढ़ आऊंगा तहज़ीब हाफ़ी को,
उनसे नई गजल के लिए शब्द उधार लाउंगा,
मैं मेरी शिकायतें करना छोड़ दूंगा इंसानों से,
इनके बस का ही नहीं है, मैं अपने जख्म सिर्फ खुदा को दिखाऊंगा.....
फिर किसी दिन मेरे जहन में वैचारिक लड़ाई जरूर होगी,
या तो मैं लड़ूंगा खुदा से, या फिर लड़ाई खुद से होगी...
मैं फिर कहता हूं, किसी दिन कलम से मेरी माथाखपाई जरूर होगी,
मेरी डायरी से किसी दिन मेरी लड़ाई जरूर होगी....
No comments:
Post a Comment